Dhindora24 Exclusive: महासमुंद में ‘पालना घर’ के नाम पर DMF फंड में भारी बंदरबांट, नियमों को ताक पर रखकर अपनों को रेवड़ियां बांटने का आरोप, सामाजिक कार्यकर्ता ने की मामले की शिकायत

महासमुंद। जिले में खनिज संपदा से प्राप्त होने वाली जनहित की राशि (DMF फंड) के दुरुपयोग का एक बड़ा मामला सामने आया है। कलेक्ट्रेट परिसर स्थित ‘गढ़कलेवा’ को बंद कर वहां ‘पालना घर’ विकसित करने के नाम पर लगभग 10 लाख रुपये की राशि में भारी वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता और पूर्व पार्षद पंकज साहू की शिकायत के बाद अब यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शिकायत के अनुसार, तत्कालीन कलेक्टर प्रभात मलिक के निर्देश पर गढ़कलेवा को विस्थापित कर पालना केंद्र बनाया गया। इसके लिए DMF फंड से ₹9,99,133 की राशि स्वीकृत की गई। नियमतः DMF फंड का उपयोग उत्खनन प्रभावित क्षेत्रों के 7 किमी के भीतर विकास कार्यों के लिए होना चाहिए, लेकिन इस मामले में नियमों को दरकिनार कर कलेक्ट्रेट परिसर में ही राशि खपा दी गई।
कैसे हुआ भ्रष्टाचार, जानिए प्रमुख बिंदु एक नजर में
अधिकारी ही बने वेंडर: सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि महिला बाल विकास विभाग के तत्कालीन अधिकारी समीर पाण्डे ने स्वयं के नाम पर ₹32,500 का भुगतान लिया। वहीं, जिला बाल संरक्षण अधिकारी खेमराज चौधरी के नाम पर ₹75,000 और ₹94,069 के अग्रिम चेक व RTGS के माध्यम से आहरण किया गया।

PWD बना सप्लायर: सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए लोक निर्माण विभाग (PWD) को सप्लायर की भूमिका में दिखाया गया है। PWD के माध्यम से एयर कंडीशनर, CCTV और बिजली के सामानों की सप्लाई दिखाकर ₹2,65,590 का भुगतान प्राप्त किया गया।
साधनों की खरीद में भारी अंतर: भ्रष्टाचार का आलम यह है कि एक ही आकार (32 इंच) की LED टीवी को अलग-अलग वेंडरों से अलग-अलग कीमतों पर खरीदा गया। दाऊ अप्लायंसेज से जहाँ टीवी ₹19,200 में ली गई, वहीं एक अन्य स्थानीय स्तर पर गैर-ब्रांडेड टीवी के लिए ₹35,714 का भुगतान किया गया।

भंडार क्रय नियमों का उल्लंघन: लगभग 10 लाख रुपये के इस कार्य में किसी भी प्रकार के टेंडर या भंडार क्रय नियमों का पालन नहीं किया गया। किचन सामग्री, फर्नीचर, और सजावट के नाम पर मनमर्जी से बिल लगाकर शासन को राजस्व की क्षति पहुंचाई गई।
जांच और कानूनी कार्रवाई की तैयारी
इस पूरे मामले में महिला बाल विकास विभाग द्वारा प्रस्तुत नोटशीट और बिल-वाउचरों में भारी विसंगतियां पाई गई हैं। प्री-स्कूल किट के नाम पर रायपुर की फर्म को ₹2,36,164 का भुगतान और बिना स्पष्ट आधार के अंशकालीन स्टाफ को मानदेय का भुगतान भी संदेह के घेरे में है।
सामाजिक कार्यकर्ता पंकज साहू ने बताया कि, DMF फंड के करोड़ों रुपये का इसी तरह दुरूपयोग किया गया है। उन्होंने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 के तहत न्यायालय में मामला दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
”जब सरकारी विभाग ही सप्लायर बन जाएं और अधिकारी स्वयं को ही भुगतान करने लगें, तो पारदर्शिता की उम्मीद बेमानी है। यह सीधे तौर पर सरकारी खजाने की लूट है।” — पंकज साहू, शिकायतकर्ता
वहीं मामले में महासमुंद कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने ढिंढोरा24 के चर्चा के दौरान कहा कि, मामले का संज्ञान आपके माध्यम से सामने आई है। मैनें भी विभागीय अधिकारियों से मामले की जानकारी मांगी है, यदि इस मामले में नियमों की अनदेखी की गई है, तो संबंधित अधिकारी कर्मचारियों पर कार्रवाई जरूर की जाएगी। बहरहाल अब देखना यह होगा कि, प्रशासन इस गंभीर भ्रष्टाचार पर क्या रुख अपनाता है और दोषियों पर कार्रवाई होती है या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।



