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अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेष: वृद्धा आश्रम में किया काम, बुजुर्गों ने कहा “माँ” और हाथों में तोड़ा दम, भावनाएं ऐसी की अब “वरिष्ठजन सेवा सदन” शुरू कर महासमुंद की उषा बेसहाराओं को दे रही सहारा

मनोहर सिंह राजपूत(एडिटर इन चीफ)
महासमुंद। समाज में बदलाव लाने वाली निस्वार्थ महिला, समाज सेविकाओं की कहानियाँ हमें प्रेरित करती हैं। ये कहानियाँ साहस, त्याग और सशक्तिकरण की मिसाल हैं। अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर महासमुंद की एक ऐसी ही महिला की कहानी आपको बताने जा रहे है। यह कहानी है महासमुंद की माता कौशल्या वेलफेयर फाउंडेशन की संस्थापिका उषा साहू की। जो पिछले एक वर्ष से महासमुंद के इमलीभाठा में “वरिष्ठजन सेवा सदन” स्थापित कर, रेलवे स्टेशनों, बस स्टैंडों और सड़कों पर लावारिस मिले वरिष्ठ नागरिकों, मानसिक रूप से बीमार और परिवारों द्वारा छोड़ दिए गए लोगों को सहारा दे रही है। उन्होंने अपनी पढ़ाई बीएससी साइंस में पूरी की है। उनके पति डॉ महेंद्र साहू एक चिकित्सक है जो ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी सेवा देते है। उनके द्वारा स्थापित वरिष्ठजन सेवा सदन में फिलहाल 11 वृद्धजनों को सेवा दी जा रही है। महिला दिवस के अवसर पर समाजसेवा की मिसाल पेश कर रहीं समाजसेविका उषा साहू बुजुर्गों के लिए सहारा बनकर सामने आई हैं। इनके द्वारा स्थापित संस्था माता कौशल्या वेलफेयर फाउंडेशन के माध्यम से पिछले एक वर्ष से “वरिष्ठजन सेवा सदन” का संचालन कर रही है। जहाँ बेसहारा और जरूरतमंद बुजुर्गों को भोजन, आवास और स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। उषा साहू ने 3 से 4 सालों तक सरकार द्वारा संचालित वृद्ध आश्रमों और दिव्यांग आश्रमों में सेवाएं दी है। इस दौरान वृद्धा आश्रम के बुजुर्ग उन्हें “मां” कहकर पुकारा करते थे, जो उनके साथ उन्हें मार्मिक भावनाओं के साथ जोड़ती थी। कई दफे हालात ऐसे थे कि, बुजुर्गों के सेवा के दौरान उनके हाथों में ही कई लोगों ने दम तोड़ दिया। यह भावनाएं उन्हें झकझोर जाती थी। उन्हें लगा कि शासकीय संस्थाओं में बेसहारा और बुजुर्गों को वह सुविधा नहीं मिल रही जो मिलनी चाहिए ल, इसके बाद उन्होंने सेवा और संवेदनशीलता का प्रयास करते हुए, अपनी माँ के नाम पर, माता कौशल्या वेलफेयर फाउंडेशन की 2025 में स्थापना की। ताकि उनके माता-पिता जीते जी उसके इस कार्य को देख गौरवांवित हो सके। जहां समाज के उन बुजुर्गों के लिए कुछ किया जाए जो किसी कारणवश अकेले और असहाय जीवन जीने को मजबूर हैं। इसी सोच को साकार करने के लिए उन्होंने संस्था का पंजीयन कराया और वरिष्ठजन सेवा सदन की शुरुआत की। इस सेवा सदन में बुजुर्गों की देखभाल को प्राथमिकता दी जाती है। उन्हें समय पर पौष्टिक भोजन, रहने की व्यवस्था और आवश्यक स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। जिससे उनका जीवन सम्मानजनक और सुरक्षित बन सके।

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संस्था के संचालन में समाज के विभिन्न वर्गों का सहयोग मिल रहा है। इसमें समाजसेवी, उद्योगपति, चिकित्सक, जनप्रतिनिधि, विभिन्न सामाजिक संगठन और कार्यकर्ता भी शामिल हैं, जो आपसी सहभागिता और सहयोग से इस सेवा कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं। सभी के सामूहिक प्रयास से बुजुर्गों को बेहतर देखभाल, पोषण आहार और पारिवारिक वातावरण देने का प्रयास किया जा रहा है। महिला दिवस के अवसर पर उषा साहू का यह प्रयास, समाज के लिए प्रेरणा बनकर उभर रहा है। उनकी पहल यह संदेश देती है कि, यदि निःस्वार्थ सेवा का संकल्प और समाज का सहयोग मिल जाए तो जरूरतमंदों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। बेसहारा बुजुर्गों को सम्मान और सहारा देने का यह कार्य न केवल समाजसेवा का उत्कृष्ट उदाहरण है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन रहा है। वरिष्ठ सेवा सदन में रहने वाले बुजुर्ग माताएं भी उनके व्यवहार और सेवा से काफी खुश है।

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