छत्तीसगढ़

मानवता की सच्ची मिसाल पेश कर शीला प्रधान ने लिया देहदान का संकल्प, मृत्यु के बाद भी किसी के काम आए शरीर, यही होगा मेरे जीवन का सच्चा मोक्ष- शीला

महासमुंद। सेवा संकल्प अभियान के अंतर्गत दान उत्सव मनाया जा रहा है इसी तारतम्य में सेवा और परोपकार की, एक ऐसी प्रेरणादायी मिसाल सामने आई है, जो जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद भी मानवता की, सेवा का संदेश देती है। महासमुंद निवासी एवं महिला एवं बाल विकास विभाग में पर्यवेक्षक के पद पर कार्यरत शीला प्रधान ने देहदान का संकल्प लेते हुए आज अपना घोषणा-पत्र कलेक्टर विनय कुमार लंगेह को सौंपा। आज उनके इस पुण्य कार्य सेवा के लिए सेवा सेतु शिविर कोसरंगी में शाल,श्रीफल ,गुलदस्ता देकर सम्मानित किया गया। इस आशय का प्रमाण पत्र भी प्रदान किया गया। इस अवसर पर शीला प्रधान ने कहा कि जीवन केवल अपने लिए जीने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन की, सार्थकता इस बात में है कि हम किसी के काम आ सकें। उन्होंने कहा कि, ये मानवता की, ये नैतिक जिम्मेदारी है कि, हम समाज के किसी तरह काम में आ सके।
वे एकल महिला हैं और अपने जीवन को परोपकार तथा समाजसेवा के कार्यों के लिए समर्पित करना चाहती हैं। इसी भावना से उन्होंने मृत्यु के बाद अपना शरीर चिकित्सा शिक्षा एवं मानव कल्याण के लिए दान करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा, “मेरे जाने के बाद भी यदि मेरा शरीर किसी विद्यार्थी की पढ़ाई में काम आए, चिकित्सा के क्षेत्र में किसी के ज्ञान को आगे बढ़ाने में सहायक बने या किसी जरूरतमंद के काम आ सके, तो इससे बड़ी सार्थकता मेरे जीवन के लिए और क्या होगी। मैं अपने इस निर्णय को लेकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रही हूं। मेरे लिए यही असली मोक्ष होगा कि, मृत्यु के बाद भी मेरा शरीर किसी के काम आए।” कलेक्टर विनय कुमार लंगेह ने शीला प्रधान के इस संवेदनशील एवं परोपकारी निर्णय की, सराहना करते हुए इसे समाज के लिए प्रेरणादायी बताया। उन्होंने कहा कि, देहदान का संकल्प मानव सेवा की, ऐसी भावना को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति अपने जीवन के बाद भी समाज के लिए उपयोगी बने रहने की, इच्छा रखता है।शीला प्रधान के इस निर्णय की, उनके परिवारजनों, विभागीय अधिकारियों-कर्मचारियों तथा उनके करीबियों ने भी सराहना की है। उन्होंने कहा कि, उनका यह निर्णय दूसरों को भी देहदान के प्रति जागरूक होने और मानवता की, सेवा के लिए आगे आने की प्रेरणा देगा। वास्तव में यह संकल्प इस विचार को मजबूत करता है कि, सेवा की, कोई अंतिम सीमा नहीं होती। जीवन समाप्त होने के बाद भी यदि किसी का शरीर चिकित्सा शिक्षा, शोध और मानव कल्याण में योगदान दे सके, तो वह जीवन की, अंतिम विदाई को भी एक नई सार्थकता दे जाता है।

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