छत्तीसगढ़

भाजपा की साय सरकार ने बिना टेंडर गुपचुप तरीके से HLL को लैब और अमृत फार्मेसी का दे दिया ठेका, दागी कंपनी को काम देकर भाजपा सरकार जनता के पैसे की कर रही बरबादी : विनोद चंद्राकर

महासमुंद। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा राज्य के सभी सरकारी अस्पतालों की पैथोलॉजी जांच और अमृत फार्मेसी का संचालन बिना टेंडर एचएलएल लाइफ केयर लिमिटेड को सौंपे जाने पर पूर्व संसदीय सचिव एवं महासमुंद के पूर्व विधायक विनोद सेवनलाल चंद्राकर ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने इसे स्वास्थ्य विभाग का सबसे बड़ा घोटाला और जनता के पैसे की खुली लूट करार दिया है।
श्री चंद्राकर ने जारी बयान में कहा कि, सरकार ने पीपीपी मॉडल के नाम पर पूरे प्रदेश के जिला अस्पतालों, सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की, लैब एक निजी कंपनी को सौंप दी है। इस समझौते के तहत सरकार 1000 करोड़ रुपये की, अत्याधुनिक मशीनें, भवन, जगह और पूरा स्टाफ मुफ्त में देगी। साथ ही कंपनी के 2.5 करोड़ रुपये के वेतन का भार भी सरकार ही उठाएगी। इसके बावजूद मरीजों से जांच का शुल्क वसूला जाएगा और सरकार को प्रति टेस्ट अलग से भारी भुगतान करना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि, यह समझौता पूरी तरह से एकतरफा है। इसमें कंपनी का कोई वित्तीय जोखिम नहीं है। सरकार जमीन, बिल्डिंग, बिजली, पानी, मशीन और स्टाफ सब देगी और ऊपर से वेतन भी देगी। फिर भी मुनाफा कंपनी कमाएगी। इससे साफ है कि, सरकार बचत नहीं बल्कि बरबादी कर रही है। पूर्व विधायक ने सबसे गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि जिस कंपनी को यह ठेका दिया गया है, उसके खिलाफ मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में सीबीआई की जांच चल रही है और एफआईआर भी दर्ज है। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन सीजीएमएससी के अपने नियमों में स्पष्ट है कि जिस फर्म पर सीबीआई जांच चल रही हो वह किसी भी टेंडर प्रक्रिया में भाग नहीं ले सकती। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने सभी नियमों और पारदर्शिता को ताक पर रखकर सीधे नामिनेशन दे दिया।
श्री चंद्राकर ने जीएफआर-2017 का हवाला देते हुए कहा कि, शासन के नियमों के अनुसार कोई भी कार्य बिना टेंडर केवल 4 विशेष परिस्थितियों में ही नामिनेशन पर दिया जा सकता है। पहली – बाढ़, आपदा या महामारी जैसी आपात स्थिति, दूसरी – बार बार टेंडर फेल होना, तीसरी – काम करने वाली एकमात्र संस्था होना,चौथी – सरकार को पुख्ता विश्वास हो कि, इससे बड़ी राशि की, बचत होगी। लेकिन वर्तमान मामले में इन चारों में से कोई भी शर्त पूरी नहीं होती। इसके बावजूद साय सरकार ने प्रदेश के दो सबसे बड़े स्वास्थ्य कार्य सभी सरकारी अस्पतालों की, लैब का संचालन और अमृत फार्मेसी खोलने का ठेका एक ही कंपनी को सौंप दिया। उन्होंने कहा यदि सीजीएमएससी सही काम नहीं कर पा रही तो उसे दुरुस्त किया जाए, उसमें सुधार किया जाए। लेकिन सरकारी अस्पतालों की, पूरी व्यवस्था, इक्विपमेंट और फैकल्टी को निजी हाथों में सौंप देना जनता के साथ धोखा है। पैथोलॉजी का ठेका देने के बाद सालों से काम कर रहे अनुभवी डॉक्टरों, टेक्नीशियनों और लैब कर्मचारियों को अचानक बेरोजगार कर दिया गया है। सरकार मानव संसाधन को बर्बाद कर रही है।
पूर्व विधायक ने सरकार के 250-300 करोड़ बचत के दावे को भी खारिज किया। उन्होंने कहा कि,जांच दरों में मामूली कमी दिखाकर बड़ा खेल किया जा रहा है। हकीकत में सरकार को प्रति टेस्ट कई गुना भुगतान करना पड़ेगा। पहले से खरीदी गई मशीनें आज धूल खा रही है। और अब उनके संचालन का ठेका भी निजी हाथों में दे दिया गया। अमृत फार्मेसी के ठेके पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि, जब प्रदेश में पहले से प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों के माध्यम से सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध हैं, तो फिर ऐसी दागी कंपनी को अमृत फार्मेसी का ठेका देने का औचित्य क्या है? इसका एकमात्र मकसद लोकल परचेस के नाम पर अस्पतालों में दवा का स्टॉक खत्म बताकर मरीजों को महंगी दवा खरीदने के लिए मजबूर करना है। गरीब मरीजों को दोहरी मार पड़ेगी।
अंत में श्री चंद्राकर ने मांग की, कि, सरकार इस अवैध नामिनेशन को तत्काल निरस्त करे, पुराने कर्मचारियों को वापस काम पर ले और पूरे मामले की, उच्च स्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराए। उन्होंने कहा कि, भाजपा सरकार स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील क्षेत्र में भी भ्रष्टाचार और मिलीभगत को संरक्षण दे रही है। सरकार की, मनमानी व अनैतिक कार्यों को प्रदेश की, जनता देख रही है, इसकी कीमत भाजपा को 2028 में चुकानी पड़ेगी।

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